तो फिर गैर हिन्दुओं इन चीजों का भी त्याग कर देना चाहिए?

अगर संस्कृत भाषा गैर हिन्दू को हिन्दू बनती है तो फिर गैर हिन्दुओं इन चीजों का भी त्याग कर देना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया है की केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से हिंदी-संस्कृत में सुबह की प्रार्थना हो रही है जो कि पूरी तरह असंवैधानिक है और इससे एक विशेष धर्म से जुड़ी मान्यताओं और ज्ञान का प्रचार होता है। जाहिर सी बात है अगर कोई याचिका दायर करता है तो कोर्ट तो जानकारी जरूर लेगा लेकिन कोर्ट के बहाने आये दिन देश में ऐसे कई बातों को उठाया जाता है जो न तो तर्क संगत और और नहीं देश की एकता के लिए सही.

याचिका के बाद कोर्ट ने इसपर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार और केंद्रीय विद्यालय संगठन से पूछा है कि क्या हिंदी और संस्कृत में होने वाली प्रार्थना से किसी धार्मिक मान्यता को बढ़ावा मिल रहा है?

हमने पता लगाया और पाया की कोइन सी पार्थना केंद्रीय विधालयों में पद्य जाता है 

केन्द्रीय विद्यालय की प्रार्थना है:

असतो मा सद्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मामृतं गमय

दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना

दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना

हमारे ध्यान में आओ प्रभु आंखों में बस जाओ

अंधेरे दिल में आकर के प्रभु ज्योति जगा देना

बहा दो प्रेम की गंगा दिलों में प्रेम का सागर

हमें आपस में मिल-जुल कर प्रभु रहना सिखा देना

हमारा धर्म हो सेवा हमारा कर्म हो सेवा

सदा ईमान हो सेवा व सेवक जन बना देना

वतन के वास्ते जीना वतन के वास्ते मरना

वतन पर जां फिदा करना प्रभु हमको सिखा देना

दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना।

ॐ सहनाववतु

सहनै भुनक्तु

सहवीर्यं करवावहै

तेजस्विनामवधीतमस्तु

मा विद्विषावहै

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

तीन हिस्सों में बंटी इस प्रार्थना का पहला और अंतिम भाग संस्कृत में है तथा मध्य भाग हिंदी में है। इस प्रार्थना का पहला भाग ऋग्वेद से लिया गया है तथा अंतिम भाग कठोपनिषद् से लिया गया है। इस प्रार्थना के पहले हिस्से का अर्थ है, ‘असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।’ यह याचना ईश्वर, खुदा, गॉड आदि से की जाती है। हां, यदि कोई नास्तिक है तो उसे आपत्ति हो सकती है लेकिन इस प्रार्थना से जुड़ा एक बेहद खास किस्सा याद आ गया है तो उसे भी बताता चलता हूं। यदि उस किस्से के मर्म को समझ लिया तो नास्तिक होने के बावजूद भी इससे आपको कोई आपत्ति नहीं होगी…

संस्कृत को सभी भाषाओँ की जननी(माँ) कहा जाता है तो फिर तो उन्हें अपना कोई दूसरी भासा बना लेनी चाहिए जिनको संस्कृत भाषा में भी एक धर्म का प्रचार नजर आता है।

चुकी भारत संस्कृति और सभ्यताओं का देश और यंहा की प्राचीन भाषा संस्कृत है और वर्तमान में बोल चल की भाषा हिंदी तो जाहिर है आपको यंहा अधिकतर चीजे इन्ही भाषाओ में मिलेगा आइये देखते खुछ ऐसे ही महत्व पूर्ण बिंदु जिन पर शायद इनका ध्यान न गया हो नहीं तो ये अभी तक इनका त्याग कर चुके होते 

१. पहले मई बात करता हु देश के सबसे बड़े हॉस्पिटल AIIMS जिसका ध्येयवाक्य ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ है इसका अर्थ होता है कि शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। तो फिर जिनको संस्कृत भाषा से परेशानी है उन्हें यंहा इलाज नहीं करना चाहिए? या गैर हिन्दुओं को नहीं आना चाहिए नहीं तो वे हिन्दू बन जाएंगे।

२. देश की आर्मी हमारी थल सेना  ध्येय वाक्य है, ‘सेवा अस्माकं धर्मः’ यानी सेवा हमारा धर्म है। यह संस्कृत में है। सेना ना सिर्फ हमारी रक्षा एवं सुरक्षा के लिए सीमा पर तैनात रहती है बल्कि आतंरिक आपदाओं के समय भी हमारी मदद भी करती है। अब यदि संस्कृत हिंदू भाषा है तो कभी कोई गैरहिंदू किसी सेना के जवान से मदद ना ले और ना ही सेना में अपने बच्चे को भेजे।

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का ध्येय वाक्य भी ‘असतो मां सद्गमय’ है तो क्या गैर हिन्दू यंहा पढाई नहीं करते यंहा भी संस्कृत है तो वहां भी गैरहिंदू अपने बच्चों को ना पढ़ाएं। IIT हों या IIM, उनके ध्येयवाक्य भी संस्कृत में हैं। तो वहां भी गैरहिंदू अपने बच्चों को ना भेजें।

सबसे महत्वपूर्ण भारतीय नोट जी सबने बचपन से देखा है ना ध्यान नहीं गया वंहा से भी आप हिन्दू बन सकते हो ध्यान कैसे जाता नोट तो सीधा जेब में जाता है ना और ज़्यदा हो तो कोई किसी को बताता कहा है इनकम टैक्स की दर से चलो मै बता देता हु कैसे हिन्दू बन सकते हो आप, "सत्यमेव जयते " यद् आया नोट निकल लो और और जो इसे तरह के याचिका दायर करते है उन्हें भी वो नोट उसे नहीं करना चाहिए वंहा भी गैर हिन्दू को हिंदुअ बनाया जा रहा है।

उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीमकोर्ट लगता है याचिका दायर करने से पहले उन्होंने इन्ही देखना भूल गए की पहले तो वो वंहा याचिका दायर करने जा रहे है जंहा वो पहले से वकील है वंही लिखा है संस्कृत में  यतो धर्मस्ततो जयः॥ (Yato dharmas tato jayah); Whence law (dharma), thence victory. (Sanskrit) 

अब क्या करे???

बस मीडिया में जगह बनाने के लिए आप ऐसे PIL ना लगाए जिससे भारत की अखंडता और देश के सौहाद्र पे आंच आ जाये,  बहुत सारे मामले ऐसे है जंहा आप अपने ज्ञान का इस्तेमाल कर सकते है और आपके पास जायदा टाइम है और आप फ्री है तो किसी गरीब से मोती फीस ना लेते हुए उसे जल्दी से न्याय दिलाये